Thursday, 25 October 2012

अफ़्ग़ानिस्तान


                                                 अफ्घनिथानी औरत मिलिट्री ऑफिसर

                                                            अफ़्ग़ानिस्तान 
इस्लामिक गणराज्य दक्षिणी मध्य एशिया में अवस्थित देश है अफ़्ग़ानिस्तान ! जो चारो ओर से जमीन से घिरा हुआ है । प्रायः इसकी गिनती मध्य एशिया के देशों में होती है पर देश में लगातार चल रहे संघर्षों ने इसे कभी मध्य पूर्व तो कभी दक्षिण एशिया से जोड़ दिया है। इसके पूर्व में पाकिस्तान, उत्तर पूर्व में भारत तथा चीन, उत्तर में ताजिकिस्तान, कज़ाकस्तान तथा तुर्कमेनिस्तान तथा पश्चिम में ईरान है।

प्राचीन काल में फ़ारस तथा शक साम्राज्यों का अंग रहा अफ़्ग़ानिस्तान कई सम्राटों, आक्रमणकारियों तथा विजेताओं की कर्मभूमि रहा है । इनमें सिकन्दर,फारसी शासक दारा प्रथम, तुर्क,मुगल शासक बाबर, मुहम्मद गौरी, नादिर शाह इत्यादि के नाम प्रमुख हैं। ब्रिटिश सेनाओं ने भी कई बार अफ्गानिस्तान पर आक्रमण किया । वर्तमान में अमेरिका द्वारा तालेबान पर आक्रमण किये जाने के बाद नाटो(NATO) की सेनाएं वहां बनी हुई हैं।

अफ़्ग़ानिस्तान के प्रमुख नगर हैं - राजधानी काबुल, कंधार । यहाँ कई नस्ल के लोग रहते हैं जिनमें पश्तून (पठान या अफ़ग़ान) सबसे अधिक हैं। इसके अलावा उज्बेक, ताजिक, तुर्कमेन और हज़ारा शामिल हैं । यहाँ की मुख्य भाषा पश्तो है। फ़ारसी भाषा के अफ़गान रूप को दरी कहते हैं।
अफ़्ग़ानिस्तान का नाम अफ़ग़ान और स्तान से मिलकर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है अफ़गानों की भूमि। स्तान इस क्षेत्र के कई देशों के नाम में है जैसे - पाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कज़ाख़स्तान, हिन्दुस्तान इत्यादि जिसका अर्थ है भूमि या देश। अफ़्गान का अर्थ यहां के सबसे अधिक वसित नस्ल (पश्तून) को कहते है। अफ़्गान शब्द को संस्कृत अवगान से निकला हुआ माना जाता है। ध्यान रहे के "अफ़्ग़ान" शब्द में ग़ की ध्वनी है और "ग" की नहीं।

इतिहास
मानव बसाहट १०,००० साल से भी अधिक पुराना हो सकता है। ईसा के १८०० साल पहले आर्यों का आगमन इस क्षेत्र में हुआ। ईसा के ७०० साल पहले इसके उत्तरी क्षेत्र मे गांधार महाजनपद था जिसके बारे में भारतीय स्रोत महाभारत तथा अन्य ग्रंथों में वर्णन मिलता है। ईसापूर्व ५०० में फ़ारस के हखामनी शासकों ने इसको जीत लिया। सिकन्दर के फारस विजय अभियान के तहते अफ़गानिस्तान भी यूनानी साम्राज्य का अंग बन गया। इसके बाद यह शकों के शासन में आए। शक स्कीथियों के भारतीय अंग थे। ईसापूर्व २३० में मौर्य शासन के तहत अफ़गानिस्तान का संपूर्ण इलाका आ चुका था पर मौर्यों का शासन अधिक दिनों तक नहीं रहा। इसके बाद पार्थियन और फ़िर सासानी शासकों ने फ़ारस में केन्द्रित अपने साम्राज्यों का हिस्सा इसे बना लिया। सासनी वंश इस्लाम के आगमन से पूर्व का आखिरी ईरानी वंश था। अरबों ने ख़ुरासान पर सन् ७०७ में अधिकार कर लिया। सामानी वंश, जो फ़ारसी मूल के पर सुन्नी थे, ने ९८७ इस्वी में अपना शासन गजनवियों को खो दिया जिसके फलस्वरूप लगभग संपूर्ण अफ़ग़ानिस्तान ग़ज़नवियों के हाथों आ गया। ग़ोर के शासकों ने गज़नी पर ११८३ में अधिकार कर लिया।

मध्यकाल में कई अफ़्गान शासकों ने दिल्ली की सत्ता पर अधिकार किया या करने का प्रयत्न किया जिनमें लोदी वंश का नाम प्रमुख है। इसके अलावा भी कई मुस्लिम आक्रमणकारियों ने अफगान शाहों की मदद से हिन्दुस्तान पर आक्रमण किया था जिसमें बाबर, नादिर शाह तथा अहमद शाह अब्दाली शामिल है। अफ़गानिस्तान के कुछ क्षेत्र दिल्ली सल्तनत के अंग थे।


 आधुनिक काल

उन्नीसवीं सदी में आंग्ल-अफ़ग़ान युद्धों के कारण अफ़ग़ानिस्तान का काफी हिस्सा ब्रिटिश इंडिया के अधीन हो गया जिसके बाद अफ़ग़ानिस्तान में यूरोपीय प्रभाव बढ़ता गया। १९१९ में अफ़ग़ानिस्तान ने विदेशी ताकतों से एक बार फिर स्वतंत्रता पाई। आधुनिक काल में १९३३-१९७३ के बाच का काल अफ़ग़ानिस्तान का सबसे अधिक व्यवस्थित काल रहा जब ज़ाहिर शाह का शासन था। पर पहले उसके जीजा तथा बाद में कम्युनिस्ट पार्टी के सत्तापलट के कारण देश में फिर से अस्थिरता आ गई। सोवियत सेना ने कम्युनिस्ट पार्टी के सहयोग के लिए देश में कदम रखा और मुजाहिदीन ने सोवियत सेनाओं के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया और बाद में अमेरिका तथा पाकिस्तान के सहयोग से सोवियतों को वापस जाना पड़ा। ११ सितम्बर २००१ के हमले में मुजाहिदीन के सहयोग होने की खबर के बाद अमेरिका ने देश के अधिकांश हिस्से पर सत्तारुढ़ मुजाहिदीन (तालिबान), जिसको कभी अमेरिका ने सोवियत सेनाओं के खिलाफ लड़ने में हथियारों से सहयोग दिया था, के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।
 वर्तमान

वर्तमान में (फरवरी २००७) देश में नाटो(NATO) की सेनाएं बनी हैं और देश में लोकतांत्रिक सरकार का शासन है। हालांकि तालिबान ने फिर से कुछ क्षेत्रों पर अधिपत्य जमा लिया है, अमेरिका का कहना है कि तालिबान को पाकिस्तानी जमीन पर फलने-फूलने दिया जा रहा है।
अफ़्ग़ानिस्तान की स्थिति
राजधानी
(और सबसे बड़ा शहर)     काबुल
34°31′ N 69°08′ E
राजभाषा(एँ)     पश्तो
सरकार     इस्लामिक गणराज्य
 - राष्ट्रपति     हामिद करजाई
 - उप राष्ट्रपति     अहमद जिया मसूद
 - उप राष्ट्रपति     करीम खलीली
 - मुख्य न्यायाधीश     अब्दुल सलाम अजीमी
स्थापना     
 - पहला अफगानी राज्य     अक्टूबर १७४७
 - यूनाईटेड किंगडम से स्वतंत्रता     १९ अगस्त, १९१९
क्षेत्रफल
 - कुल     ६४७,५०० किमी² (४१ वां)
२५१,७७२ मील²
 - जल(%)     ०
जनसंख्या
 - २००८ अनुमान     ३२,७३८,३७६ (३७ वां)
 - १९७९ जनगणना     १३,०५१,३५८
 - जन घनत्व     ४६/किमी² (१५० वां)
११९/मील²
सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) (पीपीपी)     २००८ अनुमान
 - कुल     $२१.३४० बिलियन (९६ वां)
 - प्रति व्यक्ति     $७५८ (१७२ वां)
मानव विकास सूचकांक  (२००७)     ०.३४५ (निम्न) (१७४)
मुद्रा     अफगानी (AFN)
समय मंडल     D† (यूटीसी +४:३०)
इंटरनेट टीएलडी     .af
दूरभाष कोड     +९३



अफ़्ग़ानिस्तान इस्लामिक गणराज्य दक्षिणी मध्य एशिया में अवस्थित देश है, जो चारो ओर से जमीन से घिरा हुआ है । प्रायः इसकी गिनती मध्य एशिया के देशों में होती है पर देश में लगातार चल रहे संघर्षों ने इसे कभी मध्य पूर्व तो कभी दक्षिण एशिया से जोड़ दिया है। इसके पूर्व में पाकिस्तान, उत्तर पूर्व में भारत तथा चीन, उत्तर में ताजिकिस्तान, कज़ाकस्तान तथा तुर्कमेनिस्तान तथा पश्चिम में ईरान है।

प्राचीन काल में फ़ारस तथा शक साम्राज्यों का अंग रहा अफ़्ग़ानिस्तान कई सम्राटों, आक्रमणकारियों तथा विजेताओं की कर्मभूमि रहा है । इनमें सिकन्दर,फारसी शासक दारा प्रथम, तुर्क,मुगल शासक बाबर, मुहम्मद गौरी, नादिर शाह इत्यादि के नाम प्रमुख हैं। ब्रिटिश सेनाओं ने भी कई बार अफ्गानिस्तान पर आक्रमण किया । वर्तमान में अमेरिका द्वारा तालेबान पर आक्रमण किये जाने के बाद नाटो(NATO) की सेनाएं वहां बनी हुई हैं।

अफ़्ग़ानिस्तान के प्रमुख नगर हैं - राजधानी काबुल, कंधार । यहाँ कई नस्ल के लोग रहते हैं जिनमें पश्तून (पठान या अफ़ग़ान) सबसे अधिक हैं। इसके अलावा उज्बेक, ताजिक, तुर्कमेन और हज़ारा शामिल हैं । यहाँ की मुख्य भाषा पश्तो है। फ़ारसी भाषा के अफ़गान रूप को दरी कहते हैं।


यह हिंदुस्तान है अपना

 धन्यवाद
“कोई काम शुरू करने से पहले, स्वयं से तीन प्रश्न पूछिए – मैं यह क्यों कर रहा हूँ, इसके परिणाम क्या हो सकते हैं और क्या मैं सफल हो पाऊंगा। जब गहराई से सोचने पर इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर मिल जायें, तब आगे बढ़ें।” - चाणक्य
“हमें भूत के बारे में पछतावा नहीं करना चाहिए, न ही भविष्य के बारे में चिंतित होना चाहिए; विवेकी व्यक्ति हमेशा वर्तमान में जीते हैं।” - चाणक्य
यह हिंदुस्तान है अपना
हमारे युग-युग का सपना
हरी धरती है नीलगगन
मगन हम पंछी अलबेले

मुकुट-सा हिमगिरि अति सुंदर
चरण रज लेता रत्नाकर
हृदय गंगा यमुना बहती
लगें छ: ऋतुओं के मेले

राम-घनश्याम यहाँ घूमे
सूर-तुलसी के स्वर झूमे
बोस-गांधी ने जन्म लिया
जान पर हँस-हँस जो खेले

कर्म पथ पर यह सदा चला
ज्ञान का दीपक यहाँ जला
विश्व में इसकी समता क्या
रहे हैं सब इसके चेले।

 धन्यवाद - डॉ. गोपालबाबू शर्मा
Thanks: Gopal Babu Sharma


    यदि देश हित मरना पड़े मुझ को सहस्त्रों बार भी ।
    तो भी न मैं इस कष्ट को निज ध्यान में लाउं कभी ।।
    हे ईष भारतवर्ष में शत बार मेरा जन्म हो ।
    कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो ।।

    सर फ़रोशाने वतन फिर देखलो मकतल में है ।
    मुल्क पर कुर्बान हो जाने के अरमां दिल में हैं ।।
    तेरा है जालिम की यारों और गला मजलूम का ।
    देख लेंगे हौसला कितना दिले कातिल में है ।।
    शोरे महशर बावपा है मार का है धूम का ।
    बलबले जोशे शहादत हर रगे बिस्मिल में है


Thanks :RAM PRASAD BISMIL

 

Tuesday, 23 October 2012

निराला

 धन्यवाद
निराला
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

जन्म :
२१ फरवरी १८९६ को पश्चिमी बंगाल के मेदिनीपुर जिले के महिषादल नामक देशी राज्य में।

मूल निवास :
उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले का गढ़कोला नामक गांव।

शिक्षा :
हाई स्कूल तक हिन्दी संस्कृत बंगला व अंग्रेज़ी का स्वतंत्र अध्ययन।

कार्यक्षेत्र :
१९१८ से १९२२ तक महिषादल राज्य की सेवा की। उसके बाद से संपादन, स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य। १९२२-२३ में समन्वय (कलकत्ता) का संपादन। १९२३ के अगस्त से मतवाला के मंडल में। इसके बाद लखनऊ में गंगा पुस्तक माला कार्यालय और वहां से निकलने वाली मासिक पत्रिका सुधा से १९३५ के मध्य तक संबद्ध रहे। १९४२ से मृत्यु पर्यन्त इलाहाबाद में रह कर स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य।

वे प्रसाद पंत और महादेवी के साथ हिन्दी साहित्य में छायावाद के एक प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने कहानियाँ उपन्यास और निबंध भी लिखे हैं किन्तु उनकी ख्याति विशेषरूप से कविता के कारण ही है।

१५ अक्तूबर १९६१ को इलाहाबाद में उनका निधन हुआ।

प्रमुख कृतियाँ :
काव्यसंग्रह : परिमल, गीतिका, द्वितीय अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नए पत्ते, अर्चना, आराधना, गीत गुंज, सांध्य काकली।
उपन्यास : अप्सरा, अलका, प्रभावती, निरूपमा, कुल्ली भाट, बिल्लेसुर बकरिहा।
कहानी संग्रह : लिली, चतुरी चमार।
निबंध : रवींद्र कविता कानन, प्रबंध पद्म, प्रबंध प्रतिमा, चाबुक, चयन, संग्रह।
आज प्रथम गाई पिक पंचम

आज प्रथम गाई पिक पंचम
गूँजा है मरु विपिन मनोरम।

मरुत-प्रवाह, कुसुम-तरु फूले,
बौर-बौर पर भौंरे झूले,
पात-पात के प्रमुदित झूले,
छाई सुरभि चतुर्दिक उत्तम।

आँखों से बरसे ज्योति-कण,
परसे उन्मन - उन्मन उपवन,
खुला धरा का पराकृष्ट तन
फूटा ज्ञान गीतमय सत्तम।

प्रथम वर्ष की पांख खुली है,
शाख-शाख किसलयों तुली है,
एक और माधुरी चली है,
 धन्यवाद
गीत-गंध-रस-वर्णों अनुपम।
वसन्त आया

सखि, वसन्त आया ।
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया।

किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय-उर तरु-पतिका,
मधुप-वृन्द बन्दी-
पिक-स्वर नभ सरसाया।

लता-मुकुल-हार-गन्ध-भार भर
बही पवन बन्द मन्द मन्दतर,
जागी नयनों में वन-
यौवन की माया।

आवृत सरसी-उर-सरसिज उठे,
केशर के केश कली के छुटे,
स्वर्ण-शस्य-अञ्चल
पृथ्वी का लहराया।
जुही की कली

विजन-वन-वल्लरी पर
सोती थी सुहागभरी-स्नेह-स्वप्न-मग्न-
अमल-कोमल-तनु-तरुणी -जुही की कली,
दृग बन्द किये, शिथिल-पत्रांक में।
वासन्ती निशा थी;
विरह-विधुर-प्रिया-संग छोड़
किसी दूर देश में था पवन
जिसे कहते हैं मलयानिल।
आई याद बिछुड़न से मिलन की वह मधुर बात,
आई याद चाँदनी की धुली हुई आधी रात,
आई याद कान्ता की कम्पित कमनीय गात,
फिर क्या ? पवन
उपवन-सर-सरित गहन-गिरि-कानन
कुञ्ज-लता-पुञ्जों को पारकर
पहुँचा जहाँ उसने की केलि
कली-खिली-साथ।
सोती थी,
जाने कहो कैसे प्रिय-आगमन वह ?
नायक ने चूमे कपोल,
डोल उठी वल्लरी की लड़ी जैसे हिंडोल।
इस पर भी जागी नहीं,
चूक-क्षमा माँगी नहीं,
निद्रालस वंकिम विशाल नेत्र मूँदे रही-
किम्वा मतवाली थी यौवन की मदिरा पिये
कौन कहे ?
निर्दय उस नायक ने
निपट निठुराई की,
कि झोंकों की झड़ियों से
सुन्दर सुकुमार देह सारी झकझोर डाली,
मसल दिये गोरे कपोल गोल;
चौंक पड़ी युवती-
चकित चितवन निज चारों ओर पेर,
हेर प्यारे को सेज पास,
नम्रमुख हँसी, खिली
खेल रंग प्यारे संग।

उनकी कविथायें 

Friday, 1 April 2011

तीसरा पहर

तीसरा पहर

by Mohan Rana

[Mohan Rana, who was born in Delhi in 1964, graduated in Humanities from Delhi University. He has published six poetry collections in Hindi, Jagah (Dwelling, 1994), Jaise Janam Koi Darwaza (As If Life Were a Door, 1997), Subah ki Dak (Morning's Post, 2002), Is Chhor Par (On This Shore, 2003), Pathar Ho Jayegi Nadi (Stone-River, 2007) and Dhoop Ke Andhere Mein (In the Darkness of the Sun, 2008). Some of his poems were included in Modern Poetry in Translation special issue no 17 ‘Mother Tongues'. A bilingual collection With Eyes Closed (Suryastra; Delhi), with translations by Lucy Rosenstein, was published in 2008.

The poet and critic, Nandkishore Acharya, has written that, 'Amongst the new generation of Hindi poets, the poetry of Mohan Rana stands alone; it defies any categorisation. However, its refusal to fit any ideology doesn't mean that Mohan Rana's poetry shies away from thinking - but that it knows the difference between thinking in verse and thinking about poetry. For Mohan Rana the poetic process in itself is also thought process.'Mohan Rana lives in Bath.]

तीसरा पहर

मैंने तारों को देखा बहुत दूर
जितना मैं उनसे
वे दिखे इस पल में
टिमटिमाते अतीत के पल
अँधेरे की असीमता में,
सुबह का पीछा करती रात में
यह तीसरा पहर

और मैं तय नहीं कर पाता
क्या मैं जी रहा हूँ जीवन पहली बार,
या इसे भूलकर जीते हुए दोहराए जा रहा हूँ
सांस के पहले ही पल को हमेशा !

क्या मछली भी पानी पीती होगी
या सूरज को भी लगती होगी गरमी
क्या रोशनी को भी कभी दिखता होगा अँधकार
क्या बारिश भी हमेशा भीग जाती होगी,
मेरी तरह क्या सपने भी करते होंगे सवाल नींद के बारे में

दूर दूर बहुत दूर चला आया मैं
जब मैंने देखा तारों को - देखा बहुत पास,
आज बारिश होती रही दिनभर
और शब्द धुलते रहे तुम्हारे चेहरे से

After Midnight

I saw the stars far off -
as far as I from them:
in this moment I saw them -
in moments of the twinkling past.
In the boundless depths of darkness,
these hours
hunt the morning through the night.

And I can't make up my mind:
am I living this life for the first time?
Or repeating it, forgetting as I live
the first moment of breath every time?

Does the fish too drink water?
Does the sun feel the heat?
Does the light see the dark?
Does the rain too get wet?
Do dreams ask questions about sleep as I do?

I walked a long, long way
and when I saw, I saw the stars close by.
Today it rained all day long and the words were washed away
from your face.

நடுநிசிக்குப் பின்
நான் தொலை தூரத்து நட்சத்திரங்களைப் பார்த்தேன்
நான் எவ்வளவு தொலைவிலோ
இந்தக் கணம் அத்தனைதொலைவிலுள்ள அவற்றை
எல்லையில்லா இருளின் ஆழத்தில்
அவற்றின் கழிந்துபோன கண்சிமிட்டல்
தருணங்களைக் கண்டேன்
இந்த மூன்றாம் நாழிகையில்
என்னால் தீர்மானிக்க முடியவில்லை ;
இந்த வாழ்வை நான் முதன் முறையாகத்தான் வாழ்கின்றேனா?
அல்லது வாழ்ந்தபடியே மறந்து போய்
திருப்பித்திருப்பி நகலெடுத்துக் கொண்டிருக்கின்றேனா?
மீன் கூட தண்ணீரைப்பருகுமா?
சூரியனுக்குக் கூட சூடு உறைக்குமா?
ஒளியும் இருளைப் பார்க்குமா?
மழை கூட நனைந்து போகுமா?
கனவுகள் கூட என்னைப் போன்றேதூக்கத்தைப் பற்றி கேள்விகள் கேட்குமா?
வெகு தூரம் , வெகுவெகு தூரம் நான் வந்து விட்டேன்
நான் பார்த்தபோது நட்சத்திரங்கள் நெருக்கத்தில் இருந்தன
இன்று நாள் முழுவதும மழை பெய்து கொண்டே இருந்தது
உன் முகத்திலிருந்து எல்லா வார்த்தைகளும் வழிந்து சென்றுகொண்டே இருந்தன
தமிழ் மொழிபெயர்ப்பு : வையவன்

Poems in translations

साधारण कमीज

by Mohan Rana

दोपहर और शाम के बीच
आता है एक अंतराल
जब थक चुकी होती हैं
आवाजें क्रियाएँ

जैसे अब
समाप्त हो गई सभी इच्छाएँ,
बैठ जाता हूँ किसी भी
खाली कुर्सी पर

पीली कमीज पहने
एक लड़का अभी गुजरा
मुझे याद आई
अपनी कमीज
उन साधारण से दिनों में

यह संभव था
हाँ यह जीवन संभव था
मैं पहने हूँ अब भी
वैसी ही कमीज

A Standard Shirt

Mohan Rana

Between midday and nightfall
there comes a time
when the day's noise and actions
are already done with, just as now,
all desires quenched,
I am ready to sit down
on any chair.

A boy in a yellow shirt
has just passed by
and made me think
of a shirt of mine
in those old ordinary days.

So it was possible.
Yes, this life was possible.
And here I am, still wearing
a shirt just like that.

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(Translated in Tamil by: Vaiyavan