Saturday, 15 June 2013

जन हितकारी शोध कागज पर सौर ऊर्जा

shrivastava

जन हितकारी शोध कागज पर सौर ऊर्जा

आज उर्जा के विभिन्न क्षेत्रों में तेजी से शोध कार्य हो रहा है। सभी शोधों का उद्देश्य अनवरत रूप से सस्ती व आवश्यक बिजली प्राप्त करना है। प्राकृतिक तौर से प्राप्त होने वाली सौर उर्जा को एकत्र कर रखना अत्यन्त दुष्कर कार्य है। इसके लिए सौर सेल की आवश्यकता पढती है। जिसमे सूर्य से प्राप्त उर्जा को एकत्रित कर आवश्यकता अनुसार प्रयोग किया जा सके। पारम्पारिक रूप से सौर सेल में इस्तेमाल होने वाले इन्एक्टिव मटेरियल व अवयवो के कारण स्थान अधिक लगता है और अनेक परेशानियों का सामना करना पडता है।
अब नये शोध से उम्मीद की जा सकती है कि इस उर्जा के संग्रहण के लिए कागज या कपड़ों जैसी सस्ती सतहों पर सौर सेल को प्रिंट कर, सौर इंस्टालेशन की लागत भी काफी कम की जा सकेगी। खुले स्थानों पर प्रयोग के लिए इनको लेमिनेट कर वर्षा व तूफानी इलाकों में आसानी से प्रयोग किया जा सकेगा और सेल के फंक्शन पर कोई असर भी नहीं होगा। इन्हें आप मोड़कर अपनी जेब में रख सकते हैं। जेब से निकाल कर इस्तेमाल कर सकते हैं। बार बार मोड़े जाने पर भी इस कागजी सौर सेल की कार्य क्षमता पर कोई असर नहीं पडता। सूरज की रोशनी से इन्हे बिजली पैदा करते भी देख सकते हैं।

यह संभव हुआ है-करेन ग्लिसन, एलेक्जेंडर, माइकल कसेल व उनके मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के साथियों की शोध से। उन्होने साधारण कागज, कपड़े या प्लास्टिक पर सौर सेल को प्रिंट कर इस दिशा में कांतिकारी उपलब्धि हासिल की है। इन्होंने कुछ नये विशेष पदार्थों का निर्माण कर यह भी सिद्ध कर दिया है कि इस प्रकार भी फोटो वोल्टिक सेल बनाए जा सकते हैं। वास्तव में यह किसी प्रिन्टर से फोटो या कोई सामग्री प्रिन्ट करने जैसा है। इसमें विशेष स्याही का प्रयोग किया जाता है। विशेष प्रिन्टर से कम से कम पॉच बार प्रिंटआउट लेने पर कागज पर रंगीन चतुर्भुजों जैसी शृंखला दिखाई देती है। यही कागज प्रिंट सौर सेल या सोलर सेल बन जाता है।

वर्तमान मे सौर सेल बनाने में जिस तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है उसकी तुलना में नई तकनीक एकदम भिन्न है। मौजूदा तकनीक में तरल पदार्थों और उच्च तापमान की आवश्यकता पड़ती है। जबकि नए प्रिटिंग विधि में तरल पदार्थों के स्थान पर वाष्प का इस्तेमाल किया जाता है और इस विधि में तापमान एक सौ बीस डिग्री सेल्सियस से कम रहता है। इन सॉफ्ट कंडीशन के कारण साधारण कागज, कपड़े या प्लास्टिक पर प्रिन्ट करना संभव हो गया है। कागज पर फोटोवोल्टिक सेलों की शृंखला निर्मित करने के लिए कागज की एक ही परत पर इस नवनिर्मित पदार्थ की पाँच परतें जमा करनी पडती हैं। यह प्रक्रिया एक वैक्यूम प्रकोष्ट में करनी पढती है। सौर सेल बनाने के लिए एक प्रिंट आउट से काम नहीं चलता।

इसके पूर्व भी कई शोधकर्ताओं के द्वारा कागज पर प्रिंट सौर सेल तथा अन्य इलेक्ट्रानिक अवयवों को बनाने के प्रयास हुए किन्तु कागज की खुरदरी सतह तथा रेशे होने के कारण उन्हें पहले कागज पर एक विशेष कोटिंग की आवश्यकता पडती थी जिससे सतह चिकनी हो जाए। लेकिन वर्तमान शोध के माध्यम से साधारण कागज, टिश्यू पेपर, ट्रेसिंग पेपर, कपड़े व प्लास्टिक यहाँ तक की न्यूजप्रिंट पेपर पर भी प्रिंट कर सौर सेल बनाया जा सकता है, और यह इन सभी पर बेहतरीन कार्य भी करता है। पारम्पारिक सौर सेल उनमें इस्तेमाल होने वाले इन्एक्टिव मटेरियल व अवयवो के कारण बहुत महँगे होते हैं इनकी तुलना प्रिंट सौर सेल सस्ते होंगें।
 संपर्क- bdshrivastava@gmail.com

Chanakya Neeti Shastra - Dusara Adhyay ;

Chanakya Neeti Shastra - Doosra Adhyay ;

Chanakya Neeti Shastra - Dusara  Adhyay ;

1. झूठ बोलना, कठोरता, छल करना, बेवकूफी करना, लालच, अपवित्रता  और निर्दयता ये औरतो के नैसर्गिक दुर्गुण है.
1. Untruthfulness, rashness, guile, stupidity, avarice, uncleanliness and cruelty are a woman's seven natural flaws.
2.भोजन के योग्य पदार्थ और भोजन करने की क्षमता,  सुन्दर स्त्री और उसे भोगने के लिए काम शक्ति, पर्याप्त धनराशी तथा दान देने की भावना - ऐसे संयोगों का होना सामान्य तप का फल नहीं है .
2. To have ability for eating when dishes are ready at hand, to be robust and virile in the company of one's religiously wedded wife, and to have a mind for making charity when one is prosperous are the fruits of no ordinary austerities.
३. उस व्यक्ति ने धरती पर ही स्वर्ग को पा िलया-
१. िजसका पुत्र आग्यांकारी है.
२. िजसकी पत्नी उसकी इच्छा के अनुरूप व्यव्हार करती है.
३. िजसे अपने धन पर संतोष  है.
3. He whose son is obedient to him, whose wife's conduct is in accordance with his wishes, and who is content with his riches, has his heaven here on earth.
४. पुत्र वही है जो पिता का कहना मानता है, पिता वही है जो पुत्रों का पालन पोषण करे . मित्र वह है िजस पर आप िवशास कर सकते है और  पत्नी वही है जिससे सुख प्राप्त हो .
4. They alone are sons who are devoted to their father. He is a father who supports his sons. He is a friend in whom we can confide, and she only is a wife in whose company the husband feels contented and peaceful.
५. उनसे बचे जो आपसे मुह पर तो मीठी बाते करते है लेिकन पीठ पीछे आपको बबारद करने की योजना बनाते है. ऐसा करने वाले तो उस िवष के घड़े के समान है िजसकी उपरी सतह पर दूध है.
5. Avoid him who talks sweetly before you but tries to ruin you behind your back, for he is like a pitcher of poison with milk on top.
६. एक बुरे मित्र पर तो कभी  विश्वास ना करे. एक अच्छे मित्र पर भी विश्वास ना करे. यदि ऐसे लोग आप पर गुससा होते है तो आप के सभी राज वो खोल देगे.
6. Do not put your trust in a bad companion nor even trust an ordinary friend, for if he should get angry with you, he may bring all your secrets to light.
७. मन में सोंचे हुए कार्य को किसी के सामने प्रकट न करें बल्कि मनन पूर्वक उसकी सुरक्षा करते हुए उसे कार्य में परिणत कर दें.
 7. Do not reveal what you have thought upon doing, but by wise counsel keep it secret, being determined to carry it into execution.
८. मुर्खता दुखदायी है, जवानी भी दुखदायी है, लेिकन इससे कही ज्यादा दुखदायी िकसी दुसरे के घर जाकर उससे अहसान लेना है.
8. Foolishness is indeed painful, and verily so is youth, but more painful by far than either is being obliged in another person's house.
९. हर पहाड़ पर माणिक्य नहीं होते,  हर हाथी के सर पर मणी नहीं होता,  सज्जन पुरुष भी  हर जगह होते और हर वन मे चन्दन के वृक्ष भी नहीं होते हैं .
9. There does not exist a pearl in every mountain, nor a pearl in the head of every elephant; neither are the sadhus to be found everywhere, nor sandal trees in every forest.
[Note: Only elephants in royal palaces are seen decorated with pearls (precious stones) on
their heads].
१०. बुद्धिमान पिता  को अपने बचचो को शुभ गुणों की सीख देनी चाहिए क्योंकि नीतिज्ञ और ज्ञानी व्यक्तियों की ही कुल में पूजा होती है.
10. Wise men should always bring up their sons in various moral ways, for children who have knowledge of niti-sastra and are well behaved become a glory to their family.
११. जो माता व् पिता अपने बच्चों को शिक्षा नहीं देते है वो तो बच्चों के शत्रु के सामान हैं. क्योंकि वे विद्याहीन बालक विद्वानों की सभा में वैसे ही तिरस्कृत किये जाते हैं जैसे हंसो की सभा मे  बगुले.
11. Those parents who do not educate their sons are their enemies; for as is a crane among swans, so are ignorant sons in a public assembly.
१२. लाड-प्यार से बच्चों मे गलत आदते ढलती है. उनहे कड़ी शिक्षा देने से वे अचछी आदते सीखते है. इसीिलए बचचो को दिणडत करे, जयादा लाड ना करे.
12. Many a bad habit is developed through over indulgence, and many a good one by chastisement, therefore beat your son as well as your pupil; never indulge them. ("Spare the rod and spoil the child.")
१३. ऐसा एक भी िदन ना जाये जब आपने एक श्लोक , आधा श्लोक, चौथाई श्लोक, या केवल श्लोक का एक अक्षर नहीं िसखा, या आपने दान, अभ्यास या कोई पवित्र कार्य नहीं किया .
13. Let not a single day pass without your learning a verse, half a verse, or a fourth of it, or even one letter of it; nor without attending to charity, study and other pious activity.
१४. पत्नी का वियोग होना, आपने ही लोगो से बे-इजजत होना, बचा हुआ ऋण, दुष राजा की सेवा करना, गरीबी एवं दरिद्रों की सभा  - ये छह बाते शारीर  को बिना अग्नि के ही जला देती हैं.
14. Separation from the wife, disgrace from one's own people, an enemy saved in battle, service to a wicked king, poverty, and a mismanaged assembly: these six kinds of evils, if afflicting a person, burn him even without fire.
१५.  नदी के िकनारे बसे हुए वृक्ष , दुसरे व्यक्ति के घर मे जाने अथवा  रहने वाली स्त्री एवं बिना मंत्रियों का राजा - ये सब निश्चय ही शीघ्र नस्ट हो जाते हैं.
15. Trees on a riverbank, a woman in another man's house, and kings without counselors go without doubt to swift destruction.
१६. एक बाहण का बल तेज और विद्या है , एक राजा का बल उसकी सेना मे है, एक वैशय का बल  उसकी दौलत मे है तथा  एक शुद्र का बल उसकी सेवा परायणता मे है.
16. A brahmin's strength is in his learning, a king's strength is in his army, a vaishya's strength is in his wealth and a shudra's strength is in his attitude of service.
१७. वेशया निर्धन व्यक्ति को छोड़कर चली जाती है. प्रजा पराजित राजा को छोड़कर चली जाती है,  पक्षी फलरहित वृक्ष को छोड़ देते है.एवं  मेहमान भोजन करने के बाद घर से चल पड़ते है.
17. The prostitute has to forsake a man who has no money, the subject a king that cannot defend him, the birds a tree that bears no fruit, and the guests a house after they have finished their meals.
१८. ब्रह्मण आपने यजमानो को दक्षिणा मलने के बाद छोड़ देते है. विद्यारथी विद्या प्राप्ति के बाद गुरु  को
और पशु जले हुए वन को त्याग देते हैं.
18. Brahmins quit their patrons after receiving alms from them, scholars leave their teachers after receiving education from them, and animals desert a forest that has been burnt down.
१९. जो व्यक्ति दुराचारी, कुदृष्टि वाले , एवं बुरे स्थान पर रहने वाले  मनुष्य के साथ मित्रता करता है, वह शीघ्र नष्ट हो जाता है.
19. He who befriends a man whose conduct is vicious, whose vision impure, and who is notoriously crooked, is rapidly ruined.
२०.  प्रेम और मित्रताता बराबर वालों में अच्छी लगती है . राजा के यहाँ नौकरी करने वाले को इजजत मिलती है. व्यवसायों में वाणिज्य सबसे अच्छा है, अवं उत्तम गुणों वाली स्त्री घर में सुशोभित होती है.
20. Friendship between equals flourishes, service under a king is respectable, it is good to be business-minded in public dealings, and a handsome lady is safe in her own home.

Monday, 12 November 2012

Chanakya Neeti Shastra - Pahla Adhyay

Chanakya Neeti Shastra - Pahla Adhyay

१. सर्वशक्तिमान भगवान विष्णु  को नमन करते हुए जो तीनो लोको के स्वामी  है, मै एक राज्य के लिए  नीति  शास्त्र  के सिद्धांतों  को कहता हूँ. अनेक शास्त्रों  का आधार ले कर मै यह सूत्र  कह रहा हूँ.

1. Humbly bowing down before the almighty Lord Sri Vishnu, the Lord of the three worlds, I recite maxims of the science of political ethics (niti) selected from the various satras (scriptures).

2. जो व्यक्ति शास्त्रों के सूत्रों  का अभ्यास करके ज्ञान ग्रहण करेगा उसे अतयंत वैभवशाली कर्त्तव्य के सिद्धांत जात होगे. उसे पता चलेगा की किस  बात को करना चाहिए और िकसे नहीं करना चािहए. उसे पता चलेगा की भला कया है और बुरा कया है. उसे सर्वोत्तम का भी ज्ञान होगा.

2. That man who by the study of these maxims from the satras acquires a knowledge of the most celebrated principles of duty, and understands what ought and what ought not to be followed, and what is good and what is bad, is most excellent.

३. इसीिलए लोगो का भला करने के िलए मै उस बात को कहता हूँ की िजससे लोग सभी बातो को सही परिपेक्ष्य मे देखेगे.
3.Therefore with an eye to the public good, I shall speak that which, when understood, will lead to an understanding of things in their proper perspective.

४. एक विद्वान  भी दुखी  हो जाता है यिद वह िकसी मुर्ख  को उपदेश देता है, यदि वह एक दुष्ट पत्नी का पालन करता है या िकसी दुखी व्यक्ति के साथ अतयंत घनिष्ठ सम्बन्ध बना लेता है.

4.Even a pandit comes to grief by giving instruction to a foolish disciple, by maintaining a wicked wife, and by excessive familiarity with the miserable.

५. दुष्ट पती, झूठा मित्र , बदमाश नौकर और सर्प  के साथ िनवास साक्षात् मृत्यु के समान है.
5. A wicked wife, a false friend, a saucy servant and living in a house with a serpent in it are nothing but death.

६ . व्यक्ति को  आने वाली मुसीबतो से िनपटकर धन संचय करना चािहए. उसे धन को त्यागकर पत्नी की सुरक्षा करनी चाहिए. लेिकन यिद आत्मा की सुरक्षा की बात आती है तो उसे धन और पती दोनो को गौण समझना चािहए.
6. One should save his money against hard times, save his wife at the sacrifice of his riches, but invariably one should save his soul even at the sacrifice of his wife and riches.

७ . आगे आने वाली मुसीबतो के िलए धन संचय करे. ऐसा ना कहे की धनवान व्यक्ति को मुसीबत कैसी? जब धन साथ छोड़ता है तो संगठित धन तेजी से घटता है.
7. Save your wealth against future calamity. Do not say, "What fear has a rich man, of calamity?" When riches begin to forsake one even the accumulated stock dwindles away.

८.  उस देश मे िनवास न करे जहा आपकी कोई इजजत नहीं, जहा आप रोजगार नहीं कमा सकते, जहा आपके कोई मित्र नहीं और जहा आप कोई ज्ञान आर्जित नहीं कर सकते .
8. Do not inhabit a country where you are not respected, cannot earn your livelihood, have no friends, or cannot acquire knowledge.

९ . वहा एक िदन भी ना रके जहा ये पाच ना हो.
धनवान व्यक्ति ,
िवदान  व्यक्ति जो शास्त्रों को जानता हो,
राजा,
नदियाँ,
और चिकित्सक .
9. Do not stay for a single day where there are not these five persons: a wealthy man, a brahmin well versed in Vedic lore, a king, a river and a physician.

१० .  बुद्धिमान व्यक्ति ऐसे देश कभी ना जाए जहा ...
रोजगार कमाने का कोई माधयम ना हो.

Thursday, 8 November 2012

कबीर

 कबीर
 कबीर का जीवन परिचय
जन्म

    * कबीरदास के जन्म के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर का जन्म काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुआ। कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी रामानंद के प्रभाव से उन्हें हिन्दू धर्म की बातें मालूम हुईं। एक दिन, एक पहर रात रहते ही कबीर पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर गिर पड़े। रामानन्द जी गंगा स्नान करने के लिये सीढ़ियाँ उतर रहे थे कि तभी उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया। उनके मुख से तत्काल `राम-राम' शब्द निकल पड़ा। उसी राम को कबीर ने दीक्षा-मन्त्र मान लिया और रामानन्द जी को अपना गुरु स्वीकार कर लिया। कबीर के ही शब्दों में-
    हम कासी में प्रकट भये हैं,
    रामानन्द चेताये।
कबीरदास
    * कबीरपंथियों में इनके जन्म के विषय में यह पद्य प्रसिद्ध है-
    चौदह सौ पचपन साल गए, चन्द्रवार एक ठाठ ठए।
    जेठ सुदी बरसायत को पूरनमासी तिथि प्रगट भए॥
    घन गरजें दामिनि दमके बूँदे बरषें झर लाग गए।
    लहर तलाब में कमल खिले तहँ कबीर भानु प्रगट भए॥
 मृत्यु
कबीर ने काशी के पास मगहर में देह त्याग दी। ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के बाद उनके शव को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया था। हिन्दू कहते थे कि उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से होना चाहिए और मुस्लिम कहते थे कि मुस्लिम रीति से। इसी विवाद के चलते जब उनके शव पर से चादर हट गई, तब लोगों ने वहाँ फूलों का ढेर पड़ा देखा। बाद में वहाँ से आधे फूल हिन्दुओं ने ले लिए और आधे मुसलमानों ने। मुसलमानों ने मुस्लिम रीति से और हिंदुओं ने हिंदू रीति से उन फूलों का अंतिम संस्कार किया। मगहर में कबीर की समाधि है। जन्म की भाँति इनकी मृत्यु तिथि एवं घटना को लेकर भी मतभेद हैं किन्तु अधिकतर विद्वान उनकी मृत्यु संवत 1575 विक्रमी (सन 1518 ई.) मानते हैं, लेकिन बाद के कुछ इतिहासकार उनकी मृत्यु 1448 को मानते हैं
कबीर के दोहे

चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह ।
जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥

माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय ॥

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥

तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय ।
कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय ॥

गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥

सुख मे सुमिरन ना किया, दु:ख में करते याद ।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥

साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥

कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥

दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥

बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर ॥

साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय॥

साँई इतना दीजिए जामें कुटुंब समाय ।
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भुखा जाय॥

जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥

उठा बगुला प्रेम का तिनका चढ़ा अकास।
तिनका तिनके से मिला तिन का तिन के पास॥

सात समंदर की मसि करौं लेखनि सब बनराइ।
धरती सब कागद करौं हरि गुण लिखा न जाइ॥

साधू गाँठ न बाँधई उदर समाता लेय।
आगे पाछे हरी खड़े जब माँगे तब देय॥


Thursday, 25 October 2012

अफ़्ग़ानिस्तान


                                                 अफ्घनिथानी औरत मिलिट्री ऑफिसर

                                                            अफ़्ग़ानिस्तान 
इस्लामिक गणराज्य दक्षिणी मध्य एशिया में अवस्थित देश है अफ़्ग़ानिस्तान ! जो चारो ओर से जमीन से घिरा हुआ है । प्रायः इसकी गिनती मध्य एशिया के देशों में होती है पर देश में लगातार चल रहे संघर्षों ने इसे कभी मध्य पूर्व तो कभी दक्षिण एशिया से जोड़ दिया है। इसके पूर्व में पाकिस्तान, उत्तर पूर्व में भारत तथा चीन, उत्तर में ताजिकिस्तान, कज़ाकस्तान तथा तुर्कमेनिस्तान तथा पश्चिम में ईरान है।

प्राचीन काल में फ़ारस तथा शक साम्राज्यों का अंग रहा अफ़्ग़ानिस्तान कई सम्राटों, आक्रमणकारियों तथा विजेताओं की कर्मभूमि रहा है । इनमें सिकन्दर,फारसी शासक दारा प्रथम, तुर्क,मुगल शासक बाबर, मुहम्मद गौरी, नादिर शाह इत्यादि के नाम प्रमुख हैं। ब्रिटिश सेनाओं ने भी कई बार अफ्गानिस्तान पर आक्रमण किया । वर्तमान में अमेरिका द्वारा तालेबान पर आक्रमण किये जाने के बाद नाटो(NATO) की सेनाएं वहां बनी हुई हैं।

अफ़्ग़ानिस्तान के प्रमुख नगर हैं - राजधानी काबुल, कंधार । यहाँ कई नस्ल के लोग रहते हैं जिनमें पश्तून (पठान या अफ़ग़ान) सबसे अधिक हैं। इसके अलावा उज्बेक, ताजिक, तुर्कमेन और हज़ारा शामिल हैं । यहाँ की मुख्य भाषा पश्तो है। फ़ारसी भाषा के अफ़गान रूप को दरी कहते हैं।
अफ़्ग़ानिस्तान का नाम अफ़ग़ान और स्तान से मिलकर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है अफ़गानों की भूमि। स्तान इस क्षेत्र के कई देशों के नाम में है जैसे - पाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कज़ाख़स्तान, हिन्दुस्तान इत्यादि जिसका अर्थ है भूमि या देश। अफ़्गान का अर्थ यहां के सबसे अधिक वसित नस्ल (पश्तून) को कहते है। अफ़्गान शब्द को संस्कृत अवगान से निकला हुआ माना जाता है। ध्यान रहे के "अफ़्ग़ान" शब्द में ग़ की ध्वनी है और "ग" की नहीं।

इतिहास
मानव बसाहट १०,००० साल से भी अधिक पुराना हो सकता है। ईसा के १८०० साल पहले आर्यों का आगमन इस क्षेत्र में हुआ। ईसा के ७०० साल पहले इसके उत्तरी क्षेत्र मे गांधार महाजनपद था जिसके बारे में भारतीय स्रोत महाभारत तथा अन्य ग्रंथों में वर्णन मिलता है। ईसापूर्व ५०० में फ़ारस के हखामनी शासकों ने इसको जीत लिया। सिकन्दर के फारस विजय अभियान के तहते अफ़गानिस्तान भी यूनानी साम्राज्य का अंग बन गया। इसके बाद यह शकों के शासन में आए। शक स्कीथियों के भारतीय अंग थे। ईसापूर्व २३० में मौर्य शासन के तहत अफ़गानिस्तान का संपूर्ण इलाका आ चुका था पर मौर्यों का शासन अधिक दिनों तक नहीं रहा। इसके बाद पार्थियन और फ़िर सासानी शासकों ने फ़ारस में केन्द्रित अपने साम्राज्यों का हिस्सा इसे बना लिया। सासनी वंश इस्लाम के आगमन से पूर्व का आखिरी ईरानी वंश था। अरबों ने ख़ुरासान पर सन् ७०७ में अधिकार कर लिया। सामानी वंश, जो फ़ारसी मूल के पर सुन्नी थे, ने ९८७ इस्वी में अपना शासन गजनवियों को खो दिया जिसके फलस्वरूप लगभग संपूर्ण अफ़ग़ानिस्तान ग़ज़नवियों के हाथों आ गया। ग़ोर के शासकों ने गज़नी पर ११८३ में अधिकार कर लिया।

मध्यकाल में कई अफ़्गान शासकों ने दिल्ली की सत्ता पर अधिकार किया या करने का प्रयत्न किया जिनमें लोदी वंश का नाम प्रमुख है। इसके अलावा भी कई मुस्लिम आक्रमणकारियों ने अफगान शाहों की मदद से हिन्दुस्तान पर आक्रमण किया था जिसमें बाबर, नादिर शाह तथा अहमद शाह अब्दाली शामिल है। अफ़गानिस्तान के कुछ क्षेत्र दिल्ली सल्तनत के अंग थे।


 आधुनिक काल

उन्नीसवीं सदी में आंग्ल-अफ़ग़ान युद्धों के कारण अफ़ग़ानिस्तान का काफी हिस्सा ब्रिटिश इंडिया के अधीन हो गया जिसके बाद अफ़ग़ानिस्तान में यूरोपीय प्रभाव बढ़ता गया। १९१९ में अफ़ग़ानिस्तान ने विदेशी ताकतों से एक बार फिर स्वतंत्रता पाई। आधुनिक काल में १९३३-१९७३ के बाच का काल अफ़ग़ानिस्तान का सबसे अधिक व्यवस्थित काल रहा जब ज़ाहिर शाह का शासन था। पर पहले उसके जीजा तथा बाद में कम्युनिस्ट पार्टी के सत्तापलट के कारण देश में फिर से अस्थिरता आ गई। सोवियत सेना ने कम्युनिस्ट पार्टी के सहयोग के लिए देश में कदम रखा और मुजाहिदीन ने सोवियत सेनाओं के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया और बाद में अमेरिका तथा पाकिस्तान के सहयोग से सोवियतों को वापस जाना पड़ा। ११ सितम्बर २००१ के हमले में मुजाहिदीन के सहयोग होने की खबर के बाद अमेरिका ने देश के अधिकांश हिस्से पर सत्तारुढ़ मुजाहिदीन (तालिबान), जिसको कभी अमेरिका ने सोवियत सेनाओं के खिलाफ लड़ने में हथियारों से सहयोग दिया था, के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।
 वर्तमान

वर्तमान में (फरवरी २००७) देश में नाटो(NATO) की सेनाएं बनी हैं और देश में लोकतांत्रिक सरकार का शासन है। हालांकि तालिबान ने फिर से कुछ क्षेत्रों पर अधिपत्य जमा लिया है, अमेरिका का कहना है कि तालिबान को पाकिस्तानी जमीन पर फलने-फूलने दिया जा रहा है।
अफ़्ग़ानिस्तान की स्थिति
राजधानी
(और सबसे बड़ा शहर)     काबुल
34°31′ N 69°08′ E
राजभाषा(एँ)     पश्तो
सरकार     इस्लामिक गणराज्य
 - राष्ट्रपति     हामिद करजाई
 - उप राष्ट्रपति     अहमद जिया मसूद
 - उप राष्ट्रपति     करीम खलीली
 - मुख्य न्यायाधीश     अब्दुल सलाम अजीमी
स्थापना     
 - पहला अफगानी राज्य     अक्टूबर १७४७
 - यूनाईटेड किंगडम से स्वतंत्रता     १९ अगस्त, १९१९
क्षेत्रफल
 - कुल     ६४७,५०० किमी² (४१ वां)
२५१,७७२ मील²
 - जल(%)     ०
जनसंख्या
 - २००८ अनुमान     ३२,७३८,३७६ (३७ वां)
 - १९७९ जनगणना     १३,०५१,३५८
 - जन घनत्व     ४६/किमी² (१५० वां)
११९/मील²
सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) (पीपीपी)     २००८ अनुमान
 - कुल     $२१.३४० बिलियन (९६ वां)
 - प्रति व्यक्ति     $७५८ (१७२ वां)
मानव विकास सूचकांक  (२००७)     ०.३४५ (निम्न) (१७४)
मुद्रा     अफगानी (AFN)
समय मंडल     D† (यूटीसी +४:३०)
इंटरनेट टीएलडी     .af
दूरभाष कोड     +९३



अफ़्ग़ानिस्तान इस्लामिक गणराज्य दक्षिणी मध्य एशिया में अवस्थित देश है, जो चारो ओर से जमीन से घिरा हुआ है । प्रायः इसकी गिनती मध्य एशिया के देशों में होती है पर देश में लगातार चल रहे संघर्षों ने इसे कभी मध्य पूर्व तो कभी दक्षिण एशिया से जोड़ दिया है। इसके पूर्व में पाकिस्तान, उत्तर पूर्व में भारत तथा चीन, उत्तर में ताजिकिस्तान, कज़ाकस्तान तथा तुर्कमेनिस्तान तथा पश्चिम में ईरान है।

प्राचीन काल में फ़ारस तथा शक साम्राज्यों का अंग रहा अफ़्ग़ानिस्तान कई सम्राटों, आक्रमणकारियों तथा विजेताओं की कर्मभूमि रहा है । इनमें सिकन्दर,फारसी शासक दारा प्रथम, तुर्क,मुगल शासक बाबर, मुहम्मद गौरी, नादिर शाह इत्यादि के नाम प्रमुख हैं। ब्रिटिश सेनाओं ने भी कई बार अफ्गानिस्तान पर आक्रमण किया । वर्तमान में अमेरिका द्वारा तालेबान पर आक्रमण किये जाने के बाद नाटो(NATO) की सेनाएं वहां बनी हुई हैं।

अफ़्ग़ानिस्तान के प्रमुख नगर हैं - राजधानी काबुल, कंधार । यहाँ कई नस्ल के लोग रहते हैं जिनमें पश्तून (पठान या अफ़ग़ान) सबसे अधिक हैं। इसके अलावा उज्बेक, ताजिक, तुर्कमेन और हज़ारा शामिल हैं । यहाँ की मुख्य भाषा पश्तो है। फ़ारसी भाषा के अफ़गान रूप को दरी कहते हैं।


यह हिंदुस्तान है अपना

 धन्यवाद
“कोई काम शुरू करने से पहले, स्वयं से तीन प्रश्न पूछिए – मैं यह क्यों कर रहा हूँ, इसके परिणाम क्या हो सकते हैं और क्या मैं सफल हो पाऊंगा। जब गहराई से सोचने पर इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर मिल जायें, तब आगे बढ़ें।” - चाणक्य
“हमें भूत के बारे में पछतावा नहीं करना चाहिए, न ही भविष्य के बारे में चिंतित होना चाहिए; विवेकी व्यक्ति हमेशा वर्तमान में जीते हैं।” - चाणक्य
यह हिंदुस्तान है अपना
हमारे युग-युग का सपना
हरी धरती है नीलगगन
मगन हम पंछी अलबेले

मुकुट-सा हिमगिरि अति सुंदर
चरण रज लेता रत्नाकर
हृदय गंगा यमुना बहती
लगें छ: ऋतुओं के मेले

राम-घनश्याम यहाँ घूमे
सूर-तुलसी के स्वर झूमे
बोस-गांधी ने जन्म लिया
जान पर हँस-हँस जो खेले

कर्म पथ पर यह सदा चला
ज्ञान का दीपक यहाँ जला
विश्व में इसकी समता क्या
रहे हैं सब इसके चेले।

 धन्यवाद - डॉ. गोपालबाबू शर्मा
Thanks: Gopal Babu Sharma


    यदि देश हित मरना पड़े मुझ को सहस्त्रों बार भी ।
    तो भी न मैं इस कष्ट को निज ध्यान में लाउं कभी ।।
    हे ईष भारतवर्ष में शत बार मेरा जन्म हो ।
    कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो ।।

    सर फ़रोशाने वतन फिर देखलो मकतल में है ।
    मुल्क पर कुर्बान हो जाने के अरमां दिल में हैं ।।
    तेरा है जालिम की यारों और गला मजलूम का ।
    देख लेंगे हौसला कितना दिले कातिल में है ।।
    शोरे महशर बावपा है मार का है धूम का ।
    बलबले जोशे शहादत हर रगे बिस्मिल में है


Thanks :RAM PRASAD BISMIL

 

Tuesday, 23 October 2012

निराला

 धन्यवाद
निराला
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

जन्म :
२१ फरवरी १८९६ को पश्चिमी बंगाल के मेदिनीपुर जिले के महिषादल नामक देशी राज्य में।

मूल निवास :
उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले का गढ़कोला नामक गांव।

शिक्षा :
हाई स्कूल तक हिन्दी संस्कृत बंगला व अंग्रेज़ी का स्वतंत्र अध्ययन।

कार्यक्षेत्र :
१९१८ से १९२२ तक महिषादल राज्य की सेवा की। उसके बाद से संपादन, स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य। १९२२-२३ में समन्वय (कलकत्ता) का संपादन। १९२३ के अगस्त से मतवाला के मंडल में। इसके बाद लखनऊ में गंगा पुस्तक माला कार्यालय और वहां से निकलने वाली मासिक पत्रिका सुधा से १९३५ के मध्य तक संबद्ध रहे। १९४२ से मृत्यु पर्यन्त इलाहाबाद में रह कर स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य।

वे प्रसाद पंत और महादेवी के साथ हिन्दी साहित्य में छायावाद के एक प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने कहानियाँ उपन्यास और निबंध भी लिखे हैं किन्तु उनकी ख्याति विशेषरूप से कविता के कारण ही है।

१५ अक्तूबर १९६१ को इलाहाबाद में उनका निधन हुआ।

प्रमुख कृतियाँ :
काव्यसंग्रह : परिमल, गीतिका, द्वितीय अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नए पत्ते, अर्चना, आराधना, गीत गुंज, सांध्य काकली।
उपन्यास : अप्सरा, अलका, प्रभावती, निरूपमा, कुल्ली भाट, बिल्लेसुर बकरिहा।
कहानी संग्रह : लिली, चतुरी चमार।
निबंध : रवींद्र कविता कानन, प्रबंध पद्म, प्रबंध प्रतिमा, चाबुक, चयन, संग्रह।
आज प्रथम गाई पिक पंचम

आज प्रथम गाई पिक पंचम
गूँजा है मरु विपिन मनोरम।

मरुत-प्रवाह, कुसुम-तरु फूले,
बौर-बौर पर भौंरे झूले,
पात-पात के प्रमुदित झूले,
छाई सुरभि चतुर्दिक उत्तम।

आँखों से बरसे ज्योति-कण,
परसे उन्मन - उन्मन उपवन,
खुला धरा का पराकृष्ट तन
फूटा ज्ञान गीतमय सत्तम।

प्रथम वर्ष की पांख खुली है,
शाख-शाख किसलयों तुली है,
एक और माधुरी चली है,
 धन्यवाद
गीत-गंध-रस-वर्णों अनुपम।
वसन्त आया

सखि, वसन्त आया ।
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया।

किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय-उर तरु-पतिका,
मधुप-वृन्द बन्दी-
पिक-स्वर नभ सरसाया।

लता-मुकुल-हार-गन्ध-भार भर
बही पवन बन्द मन्द मन्दतर,
जागी नयनों में वन-
यौवन की माया।

आवृत सरसी-उर-सरसिज उठे,
केशर के केश कली के छुटे,
स्वर्ण-शस्य-अञ्चल
पृथ्वी का लहराया।
जुही की कली

विजन-वन-वल्लरी पर
सोती थी सुहागभरी-स्नेह-स्वप्न-मग्न-
अमल-कोमल-तनु-तरुणी -जुही की कली,
दृग बन्द किये, शिथिल-पत्रांक में।
वासन्ती निशा थी;
विरह-विधुर-प्रिया-संग छोड़
किसी दूर देश में था पवन
जिसे कहते हैं मलयानिल।
आई याद बिछुड़न से मिलन की वह मधुर बात,
आई याद चाँदनी की धुली हुई आधी रात,
आई याद कान्ता की कम्पित कमनीय गात,
फिर क्या ? पवन
उपवन-सर-सरित गहन-गिरि-कानन
कुञ्ज-लता-पुञ्जों को पारकर
पहुँचा जहाँ उसने की केलि
कली-खिली-साथ।
सोती थी,
जाने कहो कैसे प्रिय-आगमन वह ?
नायक ने चूमे कपोल,
डोल उठी वल्लरी की लड़ी जैसे हिंडोल।
इस पर भी जागी नहीं,
चूक-क्षमा माँगी नहीं,
निद्रालस वंकिम विशाल नेत्र मूँदे रही-
किम्वा मतवाली थी यौवन की मदिरा पिये
कौन कहे ?
निर्दय उस नायक ने
निपट निठुराई की,
कि झोंकों की झड़ियों से
सुन्दर सुकुमार देह सारी झकझोर डाली,
मसल दिये गोरे कपोल गोल;
चौंक पड़ी युवती-
चकित चितवन निज चारों ओर पेर,
हेर प्यारे को सेज पास,
नम्रमुख हँसी, खिली
खेल रंग प्यारे संग।

उनकी कविथायें